कल 5 अक्टूबर को हुआ था ऐलान , 3 वैज्ञानिकों को मिला मेडिसिन का नोबेल , रोशनी से दिमाग का स्विच On - Off करने की खोज ने जीता दिल
6 अक्टूबर 2026 · लेखक: Gaurav kumar

नोबेल प्राइज वीक 2026 की शुरुआत धमाकेदार हुई है। स्वीडन के करोलिंस्का इंस्टीट्यूट ने कल यानी 5 अक्टूबर 2026 को मेडिसिन के नोबेल का ऐलान किया, जो आज 6 अक्टूबर को भारत में ट्रेंड कर रहा है। इस साल का पुरस्कार अमेरिका के कार्ल डीसेरोथ और जर्मनी के पीटर हेगमैन और जॉर्ज नागेल को ऑप्टोजेनेटिक्स के लिए दिया गया है। ये वो तकनीक है जिससे वैज्ञानिक अब रोशनी डालकर दिमाग के किसी एक सेल को अपनी मर्जी से चालू या बंद कर सकते हैं।
मैं सच बताऊँ मुझे ये अब कल रात तक मुझे भी नहीं पता था। आज सुबह एक Google notification आया तो पता चला कि नोबेल का पहला प्राइज अनाउंस हो गया है । तब समझ आया कि ये खबर अब भारत में वायरल हो रही है। तो चलिए, बिना घुमाए-फिराए सीधा पूरी कहानी समझते हैं, वो भी बिल्कुल आसान देसी भाषा में ।
आखिर ऐलान कब और कहाँ हुआ ??
हर साल की तरह इस बार भी नोबेल प्राइज का ऐलान स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में स्थित करोलिंस्का इंस्टीट्यूट में हुआ। नोबेल असेंबली ने सोमवार , 5 अक्टूबर 2026 को दोपहर में बताया कि इस साल का फिजियोलॉजी या मेडिसिन का नोबेल तीन वैज्ञानिकों को दिया जा रहा है। इस साल का नोबेल अमेरिकी वैज्ञानिक कार्ल डीसेरोथ और दो जर्मन वैज्ञानिकों पीटर हेगमैन और जॉर्ज नागेल को मिला है। नोबेल कमेटी ने कहा है कि इन्हें " लाइट - गेटेड आयन चैनल्स और ऑप्टोजेनेटिक्स से जुड़ी खोजों के लिए " चुना गया है।
ये तीनों साइंटिस्ट आखिर कौन है ?? इनकी कहानी क्या है ??
अब सबसे दिलचस्प बात ये है कि ये तीनों अलग - अलग जगह से हैं लेकिन इनकी खोज एक ही धागे से जुड़ी है। पहले हैं कार्ल डीसेरोथ। इनकी उम्र 54 साल है और ये अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं। ये पेशे से साइकेट्रिस्ट हैं। मतलब ये दिमाग की बीमारियों को रोज अपने मरीजों में देखते थे और सोचते थे कि काश दिमाग के अंदर झाँक कर पता चल सके कि कौन सी नस खराब हो रही है। दूसरे हैं पीटर हेगमैन , जिनकी उम्र 71 साल है। ये जर्मनी की हम्बोल्ट यूनिवर्सिटी बर्लिन में पढ़ाते हैं। और तीसरे हैं जॉर्ज नागेल , जिनकी उम्र 73 साल है और ये वुर्जबर्ग यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं। ये दोनों ही बायोकेमिस्ट्री के उस्ताद हैं और सालों से एक छोटे से शैवाल , यानी तालाब में उगने वाली काई पर रिसर्च कर रहे थे। कहानी यहीं से शुरू होती है। हेगमैन और नागेल ने उस काई में एक ऐसा प्रोटीन ढूंढा जो रोशनी पड़ते ही अपने आप खुल जाता है। इसका नाम है चैनलरोडोप्सिन। ये प्रोटीन एक दरवाजे की तरह काम करता है। जैसे ही इस पर नीली रोशनी पड़ती है, ये खुल जाता है और बाहर से आयन अंदर चले जाते हैं। बस , इसी छोटी सी खोज ने पूरी दुनिया बदल दी।
ऑप्टोजेनेटिक्स आखिर है क्या ?? आइए जानते हैं...
अब आप सोचोगे कि काई वाले प्रोटीन का दिमाग से क्या लेना - देना । यहीं पर कार्ल डीसेरोथ की एंट्री होती है। उन्होंने सोचा कि अगर इस प्रोटीन को हम चूहे के दिमाग के किसी एक सेल में डाल दें, तो क्या होगा ? और उन्होंने करके दिखाया। उन्होंने उस प्रोटीन को दिमाग के एक खास हिस्से में डाला और फिर फाइबर ऑप्टिक से उस पर नीली रोशनी डाली और कमाल देखो , वो एक अकेला सेल तुरंत एक्टिव हो गया। मतलब रोशनी से दिमाग का स्विच ऑन-ऑफ होने लगा। नोबेल कमेटी ने खुद इसे बहुत आसान शब्दों में बताया है कि ऑप्टोजेनेटिक्स से " जीवित दिमाग में किसी एक नर्व सेल की एक्टिविटी को चालू या बंद करना संभव हो गया है "। सोच कर देखो , पहले हमारे पास पूरा दिमाग एक काले डिब्बे जैसा था। हमें पता था कि कुछ गड़बड़ है , पर कौन सी तार खराब है पता नहीं चलता था। अब हमारे हाथ में टॉर्च आ गई है। हम एक - एक तार पर रोशनी डालकर चेक कर सकते हैं कि ये तार यादों के लिए है , ये डर के लिए है और ये खुशी के लिए ।
इस खोज को नोबेल क्यों मिला ??
नोबेल कमेटी हर साल ऐसी खोज को प्राइज देती है जो इंसानियत के लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद हो। इस खोज ने तो न्यूरोसाइंस में एक नए दौर की ही नींव रख दी है। आज से पहले अगर किसी को डिप्रेशन होता था तो डॉक्टर को पता नहीं चलता था कि दिमाग के किस हिस्से में क्या हो रहा है लेकिन अब ऑप्टोजेनेटिक्स की मदद से वैज्ञानिक लैब में चूहों पर देख सकते हैं कि कौन सा सर्किट उदासी पैदा कर रहा है और अगर उस सर्किट को रोशनी से बंद कर दें तो उदासी भी गायब हो जाती है। इसी वजह से कमेटी ने कहा कि ये तकनीक अब दुनिया भर की हजारों लैब में इस्तेमाल हो रही है और इसने ये समझने में मदद की है कि हमारी यादें , हमारी भावनाएं और हमारा व्यवहार आखिर कैसे बनता है।
इससे आगे हमारे भविष्य में क्या होगा ? क्या हमारी बीमारियाँ ठीक होंगी ??
यहाँ पर मुझे , आपको एक बात साफ समझनी होगी। ये तकनीक अभी सीधे इंसानों पर इस्तेमाल नहीं हो रही है। अभी ये सिर्फ रिसर्च टूल है। लेकिन इसका भविष्य बहुत बड़ा है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि आने वाले 10 - 15 साल में इसी तकनीक से अंधेपन का इलाज संभव हो सकता है। जिन लोगों की आँखों की रोशनी चली गई है , उनके रेटिना में ये लाइट - सेंसिटिव प्रोटीन डालकर उन्हें फिर से थोड़ी - बहुत रोशनी दिखाई जा सकती है। इस पर अमेरिका में ट्रायल भी शुरू हो चुके हैं। इसी तरह डिमेंशिया , यानी अल्जाइमर में जहाँ इंसान अपनी यादें भूल जाता है वहाँ भी ये तकनीक बता सकती है कि यादों वाला सर्किट कहाँ टूट रहा है।
इनाम कितना मिला और आगे क्या ??
तीनों वैज्ञानिकों को कुल मिलाकर 12 मिलियन स्वीडिश क्रोनर, यानी करीब 1.2 मिलियन डॉलर की राशि मिलेगी , जिसे तीनों में बराबर बाँटा जाएगा । ये पुरस्कार उन्हें 10 दिसंबर को स्टॉकहोम में होने वाले शाही समारोह में दिया जाएगा।
तो दोस्तों, कुल मिलाकर बात ये है कि कल 5 अक्टूबर को जो अनाउंस हुआ था , वो कोई छोटी-मोटी खबर नहीं थी। ये उस तरह की खोज है जो किताबों में लिखी जाएगी। तीन वैज्ञानिकों ने मिलकर दिमाग को समझने के लिए एक ऐसी टॉर्च बना दी है जो आने वाले कई सालों तक हमें रास्ता दिखाएगी ।
(तस्वीर: प्रतीकात्मक, AI से बनाई गई।)
